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जब ज़माना तेरे बात मे जोर का है...
तो देखना हवाओं का रुख किस ओर का है!!

क्या करेगी कोई शब् तेरे ज़ज्बा-ऐ-बुलंदी का...
तू रात का नहीं सितारा किसी भोर का है!!

फिर से दी है दस्तक ग़म ने मेरे दर पे...
परेशां हूँ क्या ये ठिकाना किसी ओर का है!!

तेरे नज़रोऊ मे नज़र आता है बेगानापन...
हो न हो ये इशारा किसी ओर का है!!

अँधेरे मे साए से अपने खौफ न खा
ये सोच रोशनी का शरारा किस ओर का है!!
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