घनी छायादार शज़र सा लगता है !
ये मुकाम मुझे अपने शहर सा लगता है !!

कच्ची गुनगुनी धूप सा एक किस्सा !
सर्द जाड़ों में दोपहर सा लगता है !!

उड़ा ले गयी हवा जिन्हें साथ अपने !
उन बादलों का बरसना बेअसर सा लगता है !!

गर भरम है मेरा तो भरम ही सही !
रिश्तों को अजमाने में डर सा लगता है !!

तन्हाई के कुछ और ढब सीख लूँ !
महफिलों में रहना तो हुनर सा लगता है !!
कुछ बेमानी से क़रार  हैं 
ये इशक़  के कारोबार हैं  !

बात करने का हुनर दिलों को जीत लेता है 
यूँ ख़ामोशी मे भी'......... लफ्ज़ बेशुमार हैं !

खुद में झांक के खुद को संवार ले 
हर शख्स आइने में गिरिफ़्तार है !

नफरतों के तूफ़ान में जो घिर जाती है 
वो कश्तियाँ साहिल से दरकिनार हैं !

कोई तोड़ नहीं तिलस्म का उनके 
कितने सादादिल,,,,,,,,, अय्यार हैं !


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