सोचता हूँ.…
रुकूँ ,ठहरूं ....
जरा चाँद देखता चलूँ !
एक पुराना सिलसिला है,
उसके आते ही मेरे जाने का ,
रोज़ छिपा देता है मुझे ,
तारो कि चुनरी का जाल फेंककर !!
अक्सर ख़्वाब में मिला करता हूँ उससे ,
फिर अगले रोज़ अनमनी सी लगती है धूप
उसीके लम्स का असर है शायद !!
काश.. हक़ीक़त में भी बस यूँही
कुछ बातों क सिलसिला चले !!!
सोच रहा हूँ.……
रुकूँ ,ठहरूं …
जरा,चाँद देखता चलूँ !!!!

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