खिलता रहे चाँद
बस इस पानी मे
झील की यह हसरत
फकत ख्याली है क्या
रात को तकिये के नीचे
रखकर सोता है
ओ चाँद... सुनो ज़रा
ख्वाबों मे कुछ कशमकश
कुछ तंगहाली है क्या
शाम होते ही
नज़र आता है छत पर
चाहत का कोई पैमाना
अब भी खाली है क्या
बाद रातों के आज फिर
बादलों के पहलूनशी रहा
देखना चाँद की आखों में
कुछ लाली है क्या
चांदनी का आँचल
कुछ गहरा सा क्यूँ है
चाँद की चोखट पे
कोई सवाली है क्या !!




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