अपने नक़ाब सारे हैं |


देखो ऐसे जैसे   दिखतें  बेनक़ाब  सारे हैं । 
सबके अपने राज़ ,अपने नक़ाब सारे हैं   ॥ 

कभी आवाज़ पे अपनी खामोश रहता हूँ । 
बिना मिले भी खुद से दुआ  सलाम सारे हैं ॥ 

निभा सके न कोई वादा, खुद से ,फ़क़त शाम तक ।  
मै… तुम…वो.… क्या कहूँ बईमान  सारे हैं ॥ 

खोल दो खिड़कियाँ लम्हो की,कुछ ताज़ी हवा आने दो । 
मुद्दत से पड़े बंद  , ....... …… ये मकान सारे  हैं  ॥ 










सोचता हूँ.…
रुकूँ ,ठहरूं ....
जरा चाँद देखता चलूँ !

एक पुराना सिलसिला है,
उसके आते ही मेरे जाने का ,
रोज़ छिपा देता है मुझे ,
तारो कि चुनरी का जाल फेंककर !!

अक्सर ख़्वाब में मिला करता हूँ उससे ,
फिर अगले रोज़ अनमनी सी लगती है धूप
उसीके  लम्स का  असर है शायद !!

काश.. हक़ीक़त में भी बस  यूँही
कुछ बातों क सिलसिला चले !!!

सोच रहा हूँ.……
रुकूँ ,ठहरूं …
जरा,चाँद देखता  चलूँ  !!!!









खामोशियों को आजमा के देखते हैं !
कुछ अनसुनी सुना के देखते  हैं     !!

किनारों पे खड़े हो के देखूं अक्स मिरा !
चलो ,तुम्हें समन्दर  बना के देखते हैं !!

तन्हाई भी महकाती है ज़िन्दगी को क्या !
तमाम दीवानों कि महफ़िल सजा के देखते हैं !!

सायों का क़द बहुत बढ़ गया है अब !
चलो  दीये घर के जला के देखते हैं  !!








ये हुनर भी आज़माए कोई !
फसाना नहीं ,अब हक़ीकत सुनाये कोई!!

बिना साज़ के एक गीत की हसरत !
रात के सन्नाटे में  बारिशों को बुलाये कोई !!

बिना परों के उड़ता फिरता है !
खुद को ज़माने  की हवा लगाये  कोई !!

उलझे सिरे सुलझाने का सलीका रखिये !
ग़र हसरतें हैं ,पतंगें उड़ाए कोई !!

लुटाई वही जो कमाई उसने !
                                        दौलत, मोहोब्बत ठिकाने लगाये कोई!!
 



घनी छायादार शज़र सा लगता है !
ये मुकाम मुझे अपने शहर सा लगता है !!

कच्ची गुनगुनी धूप सा एक किस्सा !
सर्द जाड़ों में दोपहर सा लगता है !!

उड़ा ले गयी हवा जिन्हें साथ अपने !
उन बादलों का बरसना बेअसर सा लगता है !!

गर भरम है मेरा तो भरम ही सही !
रिश्तों को अजमाने में डर सा लगता है !!

तन्हाई के कुछ और ढब सीख लूँ !
महफिलों में रहना तो हुनर सा लगता है !!
कुछ बेमानी से क़रार  हैं 
ये इशक़  के कारोबार हैं  !

बात करने का हुनर दिलों को जीत लेता है 
यूँ ख़ामोशी मे भी'......... लफ्ज़ बेशुमार हैं !

खुद में झांक के खुद को संवार ले 
हर शख्स आइने में गिरिफ़्तार है !

नफरतों के तूफ़ान में जो घिर जाती है 
वो कश्तियाँ साहिल से दरकिनार हैं !

कोई तोड़ नहीं तिलस्म का उनके 
कितने सादादिल,,,,,,,,, अय्यार हैं !


                         



    खिलता रहे चाँद 
    बस इस पानी मे
    झील की यह हसरत 
    फकत ख्याली है क्या 
    रात को तकिये के नीचे 
    रखकर सोता है 
    ओ चाँद... सुनो ज़रा
    ख्वाबों मे कुछ कशमकश 
    कुछ तंगहाली है क्या 
    शाम होते ही 
    नज़र आता है छत पर 
    चाहत का कोई पैमाना 
    अब भी खाली है क्या
    बाद रातों के आज फिर 
    बादलों के पहलूनशी रहा 
    देखना चाँद की आखों में
    कुछ लाली है क्या 
    चांदनी का आँचल 
    कुछ गहरा सा क्यूँ है 
    चाँद की चोखट पे 
    कोई सवाली है क्या !!



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