चंद पन्ने ....

ज़िंदगी के चंद पन्ने कई बार टटोले हैं .....
कुछ राज़ मैंने बस अपने ही आगे खोले हैं....

बड़े नाज़ुक हैं रिश्ते रेशेम की डोर है ....
तेरे मसर्रत जहाँ मेरे खलिश उस और है..
हमने इन रिश्तों के धागे बड़े होले से खोले हैं...
कुछ राज़....

हुई फुर्सत तो चाह हुई खुद से मिलने की...
अब तमन्ना रखता है ये दिल और खुल कर जीने की..
मेरे साए अब अंधरों मे भी मुझसे बोले हैं....
कुछ राज़ ......

गीली मिटटी के आशियाने रोज़ थपथपाते हैं...
कभी छोटे तो कभी बड़े घर बनाते हैं..
नहीं जानते की एक 'घर' बनाने में कितने झमेले हैं...
छोटे हैं मासूम हैं ये बच्चे कितने भोले हैं...
कुछ राज़....

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