ये आइना भी खूब अंदाज़-ए-बयाँ रखता है!
जब देखो सच्चाईयां बयाँ करता है !!
जब थामे थे,हाथों मे खंजर ,तो काफ़िर था क्या!
अब हाथ उठा के रिहाइयों की दुआ करता है!!
जला-जला के खुद को, रोशन की महफिल जिसने!
वो चिराग,अब पुरवाइयों की सज़ा रखता है !!
अज़ीज़ कब था शब्-ए-फिराक,मेरा मुझको !
गुफ्तगुं-ए-माहताब हो,तो कौन तनहाइयों की सज़ा रखता है!!
जब देखो सच्चाईयां बयाँ करता है !!
जब थामे थे,हाथों मे खंजर ,तो काफ़िर था क्या!
अब हाथ उठा के रिहाइयों की दुआ करता है!!
जला-जला के खुद को, रोशन की महफिल जिसने!
वो चिराग,अब पुरवाइयों की सज़ा रखता है !!
अज़ीज़ कब था शब्-ए-फिराक,मेरा मुझको !
गुफ्तगुं-ए-माहताब हो,तो कौन तनहाइयों की सज़ा रखता है!!



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