बयाँ-ए-सदा की अदा तो छोड़ रखी है !
खामोशियों से बयाँ की होड़ रखी है !!

कश्तियाँ खुद ही साहिल पे लग जाएँ !
इसलिए लहर किनारों पे छोड़ रखी है !!

क्युं इतना घनघोर अँधेरा नज़र आता है !
चाँद ने अपनी महफिल सितारों पे छोड़ रखी है !!

अब क्या भरेंगे ज़ख़्म तेरे नादाँ !
तूने अपनी सेहत बीमारों पे छोड़ रखी है!!
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