आज फिर एक सोच को आवाज़ दी है !
सोचा बहुत की लिख दूँ,फिर बात टाल दी है !!
बैठे थे गुमसुम चुपचाप किसी कोने में !
ख्यालों के पंछियों को नन्ही सी परवाज़ दी है !!
तन्हा हो के भी तन्हा नहीं था उनमें !
जिन तनहाइयों को मैंने अपनी सुबहो शाम दी है !!
ताउम्र रहे बरकरार, मुस्कान मासूम बचपन की !
जिसकी हंसी ने हर खलिश बाँट दी है !!
बेअसर रहे जाम -ओ -पैमाना सारे !
के तिश्नगी मैंने यूँ बेहिसाब पी है !!
बेखुदी ,बेचैनी और बेसुकुनी !
फितरत मेरी मुझ पे एक इलज़ाम सी है !!

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Bahut hi umda, flow lajawab hai aur words bhi :)
thanks for motivation !! :)