ये हुनर भी आज़माए कोई !
फसाना नहीं ,अब हक़ीकत सुनाये कोई!!

बिना साज़ के एक गीत की हसरत !
रात के सन्नाटे में  बारिशों को बुलाये कोई !!

बिना परों के उड़ता फिरता है !
खुद को ज़माने  की हवा लगाये  कोई !!

उलझे सिरे सुलझाने का सलीका रखिये !
ग़र हसरतें हैं ,पतंगें उड़ाए कोई !!

लुटाई वही जो कमाई उसने !
                                        दौलत, मोहोब्बत ठिकाने लगाये कोई!!
 



घनी छायादार शज़र सा लगता है !
ये मुकाम मुझे अपने शहर सा लगता है !!

कच्ची गुनगुनी धूप सा एक किस्सा !
सर्द जाड़ों में दोपहर सा लगता है !!

उड़ा ले गयी हवा जिन्हें साथ अपने !
उन बादलों का बरसना बेअसर सा लगता है !!

गर भरम है मेरा तो भरम ही सही !
रिश्तों को अजमाने में डर सा लगता है !!

तन्हाई के कुछ और ढब सीख लूँ !
महफिलों में रहना तो हुनर सा लगता है !!
कुछ बेमानी से क़रार  हैं 
ये इशक़  के कारोबार हैं  !

बात करने का हुनर दिलों को जीत लेता है 
यूँ ख़ामोशी मे भी'......... लफ्ज़ बेशुमार हैं !

खुद में झांक के खुद को संवार ले 
हर शख्स आइने में गिरिफ़्तार है !

नफरतों के तूफ़ान में जो घिर जाती है 
वो कश्तियाँ साहिल से दरकिनार हैं !

कोई तोड़ नहीं तिलस्म का उनके 
कितने सादादिल,,,,,,,,, अय्यार हैं !


                         



    खिलता रहे चाँद 
    बस इस पानी मे
    झील की यह हसरत 
    फकत ख्याली है क्या 
    रात को तकिये के नीचे 
    रखकर सोता है 
    ओ चाँद... सुनो ज़रा
    ख्वाबों मे कुछ कशमकश 
    कुछ तंगहाली है क्या 
    शाम होते ही 
    नज़र आता है छत पर 
    चाहत का कोई पैमाना 
    अब भी खाली है क्या
    बाद रातों के आज फिर 
    बादलों के पहलूनशी रहा 
    देखना चाँद की आखों में
    कुछ लाली है क्या 
    चांदनी का आँचल 
    कुछ गहरा सा क्यूँ है 
    चाँद की चोखट पे 
    कोई सवाली है क्या !!





    सियाह  रात का रंग  खूब निखरता रहे ! 
    बादलों के आगोश से चाँद निकलता रहे !!

    रातों का गुजरना,शमा का जलना उससे पूछो !
    तमाम रात जो करवट बदलता रहे !!

    रहने दो आबाद मैखाना घर के किसी कोने मे!
    थोड़ी सी  पी के दिल-ऐ-बेताब संभलता रहे !!

    हर मुकाम ज़िन्दगी का पड़ाव भर है !
    मंजिल पे पोहोचूं तो नया रस्ता निकलता रहे !!



    आज फिर एक सोच को आवाज़ दी है !
    सोचा बहुत की लिख दूँ,फिर बात टाल दी है !!

    बैठे थे गुमसुम चुपचाप किसी कोने में !
    ख्यालों के पंछियों को नन्ही सी परवाज़ दी है !!

    तन्हा हो के भी  तन्हा नहीं था उनमें !
    जिन तनहाइयों को मैंने अपनी सुबहो शाम दी है !!

    ताउम्र रहे बरकरार, मुस्कान  मासूम बचपन की !
    जिसकी हंसी ने हर खलिश बाँट दी है !!

    बेअसर रहे जाम -ओ -पैमाना सारे !
    के तिश्नगी  मैंने यूँ बेहिसाब पी है !!

    बेखुदी ,बेचैनी और  बेसुकुनी !
    फितरत मेरी मुझ पे एक इलज़ाम सी है !!
    एक दिए पर कब तक.... तूफां का क़हर रहेगा !
    वक़्त आएगा इसकी लो से रोशन तेरा घर रहेगा !!

    खामियां बहुत हैं..... जीत पाऊं इनसे तो बात बने !
    तो अब शुरू मेरा..............मुझसे ये समर रहेगा !!

    चढ़ आता है ................ख्यालों का सूरज हर रात !
    सुकून-ए- छावं की खातिर,घनी यादों का शज़र रहेगा !!

    खूब वाकिफ है ..............वफा-ओ-राह से तेरी लेकिन !
    जानकर भी हाल तेरा ,.........ज़ालिम वो बेख़बर रहेगा !!

    शिद्दत-ए-आशनाई ..........आदत सी बन गयी है यानि !
    अब ताउम्र जारी........................तनहा ये सफ़र रहेगा !!

    क्यूँ भिगोती हैं ......................दश्त-ए-रुखसार मेरे !
    एक अज़ाब है ये भी ,कब तक इन आँखों मैं समंदर रहेगा !!

    shazar-tree aasnai-friendship dasht-desert
    ख्यालों की महफ़िल में रोशनी सी रखना ! 
    रूह-ए-तबियत........ सुकूनी सी रखना !!

    दौलत-ए-ख़ुशी से रोशन रहे ज़िन्दगी या रब !
    कभी ........खुबसूरत गमगीनी सी रखना !!

    ओरों से शिकवे शिकायते क्यूँ कर !
    फकत अपने लिए ये नुक्ता चीनी सी रखना !!

    हर परवाज़ बुलंद हो आसमान में, फिर भी !
    पैरों की आदत जमीनी सी रखना !!
    ये आइना भी खूब अंदाज़-ए-बयाँ रखता है!
    जब देखो सच्चाईयां बयाँ करता है !!

    जब थामे थे,हाथों मे खंजर ,तो काफ़िर था क्या!
    अब हाथ उठा के रिहाइयों की दुआ करता है!!

    जला-जला के खुद को, रोशन की महफिल जिसने!
    वो चिराग,अब पुरवाइयों की सज़ा रखता है !!

    अज़ीज़ कब था शब्-ए-फिराक,मेरा मुझको !
    गुफ्तगुं-ए-माहताब हो,तो कौन तनहाइयों की सज़ा रखता है!!
    बयाँ-ए-सदा की अदा तो छोड़ रखी है !
    खामोशियों से बयाँ की होड़ रखी है !!

    कश्तियाँ खुद ही साहिल पे लग जाएँ !
    इसलिए लहर किनारों पे छोड़ रखी है !!

    क्युं इतना घनघोर अँधेरा नज़र आता है !
    चाँद ने अपनी महफिल सितारों पे छोड़ रखी है !!

    अब क्या भरेंगे ज़ख़्म तेरे नादाँ !
    तूने अपनी सेहत बीमारों पे छोड़ रखी है!!

    जब ज़माना तेरे बात मे जोर का है...
    तो देखना हवाओं का रुख किस ओर का है!!

    क्या करेगी कोई शब् तेरे ज़ज्बा-ऐ-बुलंदी का...
    तू रात का नहीं सितारा किसी भोर का है!!

    फिर से दी है दस्तक ग़म ने मेरे दर पे...
    परेशां हूँ क्या ये ठिकाना किसी ओर का है!!

    तेरे नज़रोऊ मे नज़र आता है बेगानापन...
    हो न हो ये इशारा किसी ओर का है!!

    अँधेरे मे साए से अपने खौफ न खा
    ये सोच रोशनी का शरारा किस ओर का है!!

    बात फुर्सत की थी फुरकत पे आके ठहरी...
    बस चूक हुई जहाँ ज़ीस्त उस मुकाम पे ठहरी!!

    भूख ने गरीब को किया हैरान इस कदर
    हैरत नहीं के उनकी नज़र तवे की आंचपे ठहरी!!

    इस सबा मे मेरी सदा का असर आता नहीं तुझ तक...
    तू आसमान मे मै ज़मीन पर जो ठहरी!!

    मन हुआ दोडू, भागू,पकड़ के छू लूँ तुमको..
    मेरे नज़र जब बच्चों के मैदान पे ठहरी!!

    गज़ब हाल था उस रोज़ इस दिल का..
    जिस रोज़ तेरी उंगलियाँ मेरे रुखसार पे ठहरी!!

    furkat-saparation

    zist-लाइफ



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